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डब्लु बी सी / WBC


डब्लु  बी सी :

यहाँ इन प्रश्नो का उत्तर मिलगा डब्लु  बी सी क्या है, डब्लु बी सी कितने प्रकार क है ,



डब्लु  बी सी के फंक्शन्स क्या है. डब्लु बी सी के बढ़ने को और घने क क्या कहते हैं।  

डब्लु  बी सी जिनका मतलब वाइट ब्लड सेल्स है।  इनके सेल मं कोई नहीं होता लेकिन इनका कलर रेड ब्लड



सेल्स की तरह रेड नहीं होता इसलिए इनको वाइट ब्लड सेल्स कहा जाता है।  इनमें कोई हीमोग्लोबिन भी नहीं मिलता।  

डब्लु  बी सी   का मकसद है शरीर को कोई भी नुकसान देनी वाली इन्फेक्शन या एंटीजन से बचाना। 



अगर आप इनके फंक्शन्स या काम को समाज जायेंगे तो सारा टॉपिक आसान हो जायेगा।  लेकिन उससे पहले इनकी

नार्मल वैल्यू याद करना अनिवार्य है, यह 4000 - 11000 /mm3  इसे ज़रूर याद कर लीजियेगा। 
लेकिन यादरखीय छूटे बाचों में सेल की मात्रा ज़्यादा होती जो 20,000/mm3 है।  

डब्लु  बी सी अगर बड़जाये किसी भी कारन से तो उसे ल्यूकोसिटोसिस कहा जाता है इसका मतलब हुआ



अगर 11  ,000 से ज़्यादा काउंट होने पर ल्यूकोसिटोसिस होगी।  इसके कुछ कारन हो सकते है :
१. नवजात शिशु। 
 २. एक्सरसाइज या व्यायाम। 
३. स्ट्रेस। 
४. औरत के ३ इम्पोर्टेन फेज याद रखियेगा -- गर्भावस्था ( प्रेगनेंसी), स्तनपान कराने वाली माँ (लैक्टेशन),
मासिक धर्म ( मेंस्टुरेशन) . 
५. इन्फेक्शन (संक्रमण) . 

ल्यूकोपीनिया:

मतलब जब डब्लु  बी सी की काउंट काम जाये कितने नंबर से याद करिये( 4000 - 11000 /mm3) 4000से।  
इसके कारन है :
१. टाइफाइड ( यह बीमारी में  डब्लु बी सी काम हो जाते हैं और इनमें भी न्युट्रोफिल )
२. वायरल इन्फेक्शन में।  
३. बोन मेरो में अगर किसी भी कारन से दोष आएगा तो सरे ब्लड सेल्स में कमी आजायेगी , इसलिए बोन मेरो डिप्रेशन
४. भुकमरी ( अगर आप खाना किसी को काम देरहें है तो उनकी फिट रहने की या इन्फेक्शन को हटाने की क्षमता
काम हो जाती है।  

लीओकेमिए : एक कैंसर की कंडीशन है जहाँ डब्लु  बी सी की काउंट 50, 000 / mm3 से ज्यादा हो जाती है और
यह सेल कोई भी जरूरी कार्य नहीं करते मतलब यह सेल दीखते सामान्य है लेकिन सामान्य काम नहीं कर पते। 

डब्लु  बी सी के प्रकार : 

डब्ल्यूपीसी दो प्रकार के होते हैं एग्रेन्यूलोसाइट और ग्रेन्यूलोसाइट। अग्रणलॉयटे  जो होते हैं इनमें कोई भी



साइटोप्लास्मिक ग्रेन्यूल्स नहीं मिलते मतलब धब्बे नहीं मिलेंगे।  ग्रनुलॉयटे में ग्रनुलेस या धब्बे मिलते हैं।  

यह ए ग्रेन्यूलोसाइट के टाइप होते हैं मोनोसाइट और लिंफोसाइट। ग्रनुलॉयटे के ३ प्रकार होते हैं न्युट्रोफिल ,



एओसिनोहिल और बेसोफिल।  

न्युट्रोफिल :

न्युट्रोफिल  को पहचानना बहुत ही आसान और जरूरी है। इनका साइज 10 से 14 माइक्रोमीटर होता है।
इसमें सबसे पहला साइज हमने पढ़ लिया जो है 10 से 14 माइक्रोमीटर उसके बाद अंदर आते ही हमें साइटोप्लाज्म
मिलेगा यहां पर कैसे हम न्यूट्रोफिल्स को पहचानेगे,  न्यूट्रल कीतोप्लास्म कलर ब्रिक रेड कहा जाता है जैसे neutrophil - physiology hindi
 उसकी दूसरी खासियत यह है कि बहुत बारीक होते हैं,जिन्हें सेंड लाइक या रेत की तरह। 
इनका कलर थोड़ा सा बदल भी हो सकता है जैसे रेड ब्राउन और पर्पल की तरफ भी देख सकता है स्लाइड के अंदर।



जिसकी वजह से यह सेल। जो हटा कर रहे हैं बॉडी पर। उनको। खत्म कर सकते हैं। अगला साइटोप्लाज्म लाइट



ब्लू कलर का होता है। 

न्यूक्लियस: नुक्लेउस  की खासियत यह है कि यह पर्पल कलर का होगा सारे सेल्स  आपको हर बार पर्पल ही कलर



मिलेगा। अगला इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि यह मल्टी लोब  कहां जाता है, इसका मतलब यह है कि इसमें के न्यूक्लियस

के भाग होंगे 1-6 भाग यहां पर मिलते हैं,याद रखेगा इसलिए इनको पॉलीमोरफोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट्स कहा जाता है। 

जब यह सिर्फ छोटे होते हैं तब इनका न्यूक्लियस 1 लोब  का होता है,जैसे ही यह सेल बड़े होते जाते हैं,इनके लोब 



बढ़ते जाते हैं।  

फंक्शन: 
 सबसे पहला इंपॉर्टेंट फंक्शन है फागोकीटोसिस  मतलब एंगल करना जब न्यूट्रोफिल किसी भी और सेल और



एंटीजन के  पास पहुंचते हैं तो वह फिर सेल्स को खा जाते हैं तो लगभग 1 से 10 साल को खाने की क्षमता रखता है



न्यूट्रोफिल। 

दूसरा इंपॉर्टेंट फंक्शन है कि यह फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस। 

१. इसका मतलब यह सबसे पहले अटैक करते हैं जैसे बॉर्डर के बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स या कोई भी पोस्ट  होती है।



वैसे ही सबसे पहले अटैक करते हैं तो याद रखेगा अगर किसी भी कारण से डब्ल्यूबीसी अकाउंट न्यूट्रोफिल्स



का बड़ा है तो इसका मतलब इन्फेक्शन अभी थोड़े ही हाल में हुई है। हो सकता है कुछ घंटे दिन या बहुत ज्यादा

हुआ तो फिर एक हफ्ते तक ।

 २. बुखार बनाते हैं: बनाने वाले सब्सटेंस को रिलीज करते हैं जिन्हें कहते हैं एंडोजीनस पायरोजेंस। 

न्यूट्रोफीलिया।
मतलब अगर किसी भी कारण से न्यूट्रोफिल का काउंट बढ़ा हुआ मिले। 
१.  व्यायाम के बाद या एक्सरसाइज के बाद मिल सकता है . 
२. प्रेगनेंसी मेंस्ट्रेशन लेक्टेशन में भी .
३.  अगर किसी को भी एपीनेप्री इंजेक्शन लगी है तभी भी हमें इसका काउंट ज्यादा मिल सकता है। 

१. अगर बीमारियों की बात करें तो वहां पर एक्यूट इन्फेक्शन जैसे मैंने बताया था इन्हें फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस



कहा जाता है। 
२. फिर अगर जल गया है तब हमें न्यूट्रोफिल ज्यादा मिलेंगे। 
३. अगर किसी को बहुत ज्यादा खून निकला है। तो उसकी वजह से भी बढ़ सकते हैं .
४. हार्ट अटैक या सर्जरी के बाद भी इनका काउंट ज्यादा मिल सकता है। 

न्यूट्रोपेनिया।
 इसका मतलब हुआ कि अगर न्यूट्रोफिल की काउंट कम है.
१. यह हमें टाइफाइड में मिल जाता है जैसे पहले समझाया गया था.
२. वायरल इन्फेक्शन में मिल सकता है 
३. बच्चों में मिलता है क्योंकि बच्चों में लिंफोसाइट की काउंट थोड़ी सी ज्यादा होती है और न्यूट्रोफिल की काउंट
कम होती है। 
४. और याद रखें बोन मैरो डिप्रेशन कोई भी बोन मार्गो का दोष होगा कोई बीमारी होगी या कोई भी ड्रग्स होंगे जो,

नुकसान पहुंचा रहे हैं तो वहां पर बोन मैरो डिप्रेशन से डब्ल्यूबीसी काउंट या फिर न्यूट्रोफिल की काउंट कम हो सकती है। 


एओसीनोफिस: 
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 इनका सेल साइज 10 से 14 माइक्रोमीटर होता है। 

अगर आप नाम पर गौर दें तो इनका नाम है एओसीनोफिस मतलब रेड़  या लाल, पिंक की तरफ जाता है तो यह



एओसीन कलर उठाते हैं। इसलिए इनका नाम एओसीनोफिस है । 

साइटोप्लाज्म:
 साइटोप्लाज्म मैं आपको हर वक्त कि यहां पर रेड पिंक कलर मिलेगा। 

और यहां पर साइटोप्लाज्म में गर्नुलेस या धब्बे  गाड़ी या कोर्स होंगे, लाल कलर के होंगे और यह न्यूक्लियस के आस



पास होंगे मतलब जो  कभी भी न्यूक्लियस के ऊपर नहीं पाए जाएंगे। 

नुक्लेउस  का कलर पर्पल रहेगा जैसे बाकी सेल्स का है।  

और इनका शेप जो है ऐनक की तरह होगा मतलब बई लोब ( 2 लोब या अंग) । कुछ सेल्स में  तीन लोब भी मिल सकते हैं। 

फंक्शन:
१.  यह बहुत इंपॉर्टेंट है किसी भी पैरासाइटिक इनफेक्शन के लिए जो  छोटे पैरासाइट होते हैं जिन्हें लार्वा कहां जाता है। उनके अटैक करने में योजना  का अहम काम है।
२.  म्यूकस मेंब्रेन पर मिलते हैं जैसे रेस्पिरेट्री ट्रैक्ट, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट, यूरिनरी ट्रैक्ट तो यह लोकल इम्यूनिटी
प्रोवाइड करते हैं।
३.  फागोकीटोसिस  का काम भी करते हैं लेकिन  न्युट्रोफिल से काम राफ्तेर होने के कारन यह फागोकीटोसिस में
कमी दिखते हैं।  

एओसीनोफिलिआ :

  अगर किसी भी कारण से एओसीनोफिल की मात्रा  बढ़ जाते है।  

१.  पैरासाइटिक इनफेक्शन। 
२. अगर किसी को एलर्जी हो । 

३.त्वचा की बीमारी जैसे पित्ती । 

एओसिनपेनिआ:

अगर किसी भी कारण से एओसीनोफिल कम हो जाए तो उसे एओसिनपेनिआ  कहते हैं। 
१.स्टेरॉयड दवाई . 
२. स्ट्रेस . 

बासोफिल:







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सेल साइज 10 से 14 माइक्रोमीटर होता है। 

यह ब्लू कलर, नीला कलर उठाता है और पर्पल कलर भी हो सकता है।

 साइटोप्लाज्म 
 ब्लू कलर का दिखता है। इसमें ग्रनुलेस पाए जाते हैं, ग्रनुलेस गाड़ी होते हैं, मतलब बड़े साइज के होंगे और ब्लू कलर के,



पर्पल कलर के होंगे। ग्रनुलेस बहुत ज्यादा होते हैं और न्यूक्लियस के भी ऊपर पाए जाते हैं। नुक्लेउस  य दो या तीन हो



सकते हैं। 

फंक्शन:

एलर्जी रिएक्शन में काम आते हैं। मतलब यह एलर्जी को शुरू करते हैं याद रखिए कि एओसीनोफिल एलर्जी रिएक्शन
को रोकते हैं एक जगह तक सीमित रखते हैं वहीं बेसोफिल एलर्जिक रिएक्शन को बढ़ाते हैं तो इस तरह शरीर में
संतुलन बना रहता है। 

बासोफिलिया:
 का मतलब हो गया डब्ल्यूबीसी काउंट अगर किसी भी कारण से बाद जाता है।  

 स्पेशल का कम हो जाए यह तब मिल सकता है जब कोई स्टेरॉइड थेरेपी हो कोई ड्रग की वजह से रिएक्शन हो या
बोन मैरो डिप्रेशन हो। 
१. वायरल इनफेक्शंस हो जैसे स्मॉल पॉक्स चिकन पॉक्स इनफ्लुएंजा।  
२. एलर्जी रिएक्शन।  
३. अस्थमा।  

बसोपनीया:

बेसोफिल की मात्रा काम  कहते हैं।  
१.स्टेरॉयड दवाई . 
२. स्ट्रेस . 

लिंफोसाइट्स। 
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लिंफोसाइट्स एक प्रकार की एग्रेन्यूलोसाइट्स है। मतलब इनमें कोई भी ग्रेन्यूल नहीं पाया जाएगा या इनके



साइटोप्लाज्म में कोई भी ग्रनुलेस नहीं मिलेंगे। यह दो प्रकार के होते हैं साइंस के हिसाब से स्मॉल ओर

लार्ज लिंफोसाइट। फंक्शन के हिसाब से टी और बी लिंफोसाइट्स। 

हम यहां पर साइज के हिसाब से चलेंगे। स्मॉल लिंफोसाइट्स लगभग 7 से 10 माइक्रोमीटर के होते हैं और
लार्ज लिंफोसाइट 10 से 14 माइक्रोमीटर के होते हैं। 

आगे की जानकारी दोनों में एक है। साइटोप्लाज्म दोनों का लाइट ब्लू होगा क्लियर होगा मतलब कोई भी प्रकार
के धब्बे  नहीं पाए जाएंगे। इनका न्यूक्लियस बड़ा होता है मतलब लगभग सारे साइटोप्लाज्म में फैला होता है,
न्यूक्लियस गोल आकर का है ।

ल्य्म्फोसिटोपेनिया: 
का मतलब हो गया लिम्फोसाइट काउंट अगर किसी भी कारण से कम हो जाए । 
  १.एड्स .
 २. स्टेरॉयड दवाई . 
 ३.स्ट्रेस .
 ४.  बोनमेरो डिप्रेशन 

मोनोसाइट्स:
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मोनोसाइट्स लगभग 10 गुना न्युट्रोफिल से और तेज होते हैं मतलब यह 100 सेल्स तक खा सकते हैं। 
इनका साइटोप्लाज्म लाइट ब्लू कलर का होता है। नुक्लेउस एक मिलता है गोल होता है और इंडेंटेड या की
एकसाइड से डेंट की मिलता है।  

नुक्लेउस अपने सेंटर पोजीशन से  हटके होता है तो एक कोने में पाया जाता है इसका कलर पर्पल होगा।

 फंक्शन:
१. यह फागओसाइटोसिस में बहुत महत्वपूर है। मोनोसाइट्स न्युट्रोफिल फिर से लगभग 10 गुना सेल्स खा सकता
होते हैं मतलब यह 100 सेल्स तक खा सकते हैं। 
२. सेकंड लाइन ऑफ डिफेंस, न्युट्रोफिल के बाद यह बैक्टीरिया और वायरस मरते हैं। 
३.यह कैंसर सेल को मारने में मदद करते हैं। 

मोनोसाइटोसिस:

 मोनोसाइटोसिस मतलब मोनोसाइट काउंट जभी भी बढ़ जाए जैसे बैक्टीरियल इनफेक्शन ट्यूबरक्लोसिस।
वायरल इनफेक्शन। मलेरिया कालाजार।

मोनॉइटोपेनिया: 
 मतलब मोनोसाइट काउंट कम हो गई है यह बोन मैरो डिप्रेशन में मिलता है।

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